Wednesday, December 16, 2009

"विप्रसेतु" विचार संस्कृति - क्रांति अभियान आप भी इस अभियान में सहभागी बने

"विप्रसेतु" विचार संस्कृति - क्रांति अभियान
आप भी इस अभियान में सहभागी बने ऐसा आग्रह है........
आप कर सकते है - स्नेही स्वजनों - प्रिय मित्रों - को प्रेरित कर सकते है.......
१ -आप "विप्रसेतु"से सामाजिक संस्थानों को जोड़कर समाज को एक चोपाल

पर बैठकर विचारमंथन के लिए, एकमना होकर कार्य करने के प्रेरित कर
सकते है जिसकी आज हमें सबसे ज्यादा जरुरत है.
२ - आप समय-समय पर "विप्रसेतु"में सामाजिक संस्थानों की गतिविधियों
की जानकारी देकर समाज में चेतना और जाग्रति का शंखनाद कर सकते है.
३ -आप "विप्रसेतु"के बारे में सुझाव देकर इसे जन-जन की पत्रिका बनने में
सहयोग कर सकते है.
४ -आप "विप्रसेतु" में अपनी व्यावसायिक फर्म का विज्ञापन देकर पत्रिका
को आर्थिक संबल तो प्रदान करेंगे ही समाज को आपके सामर्थ्य का
व्यापक परिचय मिलेगा जिसका आपको चतुर्दिक लाभ मिलना तय है.
५ -आप "विप्रसेतु" के "संपोषक-सदस्य" बनकर पत्रिका के
प्रचार - प्रसारमें महत्तवपूर्ण भूमिका निभा सकते है.
६ -आप "विप्रसेतु"के अधिकाधिक सदस्य बनाकर समाज को एकसूत्र में बाँधने
का महत्ती कार्य कर सकते है।
सदस्यता:
"संपोषक" : रूपए २१,०००/-
"संरक्षक" : रूपए ५,१००/-
"आजीवन" : रूपए २,१००/-
विज्ञापन शुल्क ; वार्षिक
बहुरंगीय ( अंतिम आवरण पृष्ठ ) : रूपए २१,०००/-
बहुरंगीय ( २ / ३ आवरण पृष्ठ ) : रूपए १५०००/-
एकरंगीय पूर्ण पृष्ठ : रूपए ६,१००/ -
श्वेतश्याम पूर्ण पृष्ठ
: रूपए ४,५००/-
श्वेतश्याम अर्ध पृष्ठ
: रूपए २,५००/-
श्वेतश्याम १/४ पृष्ठ
: रूपए १,५००/-
प्रति अंक
शुभकामना श्वेतश्याम पूर्ण पृष्ठ : रूपए १,१००/-
श्रधांजलि श्वेतश्याम पूर्ण पृष्ठ : रूपए ५००/-
चित्रमय शुभकामना : रूपए १००/-
वैवाहिक विज्ञापन : रूपए १००/-
( प्रथम प्रकाशन निशुल्क )

समाज
नव-निर्माण के इस महायज्ञ में आपके निर्मल मन और पवित्र हाथों

से पड़ने वाली आहुति का इंतजार रहेगा.
संपर्क :
रामकृष्ण सेवदा
सूर्य सदन , जी .एस .रोड , बीकानेर ( राजस्थान ) INDIA
cell :
०९३१२२ ७४५२२
०९४६०७ ०३१५६
email :
viprasetu@gmail.com
rksevada@gmail.com

Sunday, December 6, 2009

"विप्रसेतु" एक विचार संस्कृति - क्रांति अभियान


"विप्रसेतु" समाज के सञ्चालन - पालन में उपचारात्मक - सुधारात्मक - एवं सकारात्मक सहकार - सहयोगप्रदानकर शिक्षित - संस्कारित - स्वस्थ - समर्थ - समरस समाज के निर्माण के लिए एक विचार संस्कृति - क्रांति अभियान है
उज्जवल भविष्य के सूत्र :
साधना
- स्वाध्याय - संयम - सेवा
सुखद
भविष्य के सूत्र :
व्यस्त
रहें - मस्त रहें
सुख बाँटें - दुःख बँटाये
मिल
बाँट कर खाएं - खिलाएँ
सलाह
लें - सम्मान दें
सामाजिक
समरसता के सूत्र :
संगत - पंगत - लंगर
सफलता
के सूत्र :
स्नेह
- सहयोग - सदभाव - सकारात्मक कर्म
चेतना
जाग्रति के सूत्र :
स्वस्थ
- स्वच्छ संयमित - पवित्र मानसिकता
आत्मोत्थान
के सूत्र :
अभिमान
का त्याग
अतिकाम का
त्याग
अतिलोभ
का त्याग

अतिमोह
का त्याग
अतिमात्सर्य
का त्याग
आप भी इस अभियान में सहभागी बनें !

विप्रसेतु" पत्रिका नहीं प्रकल्प है


" विप्रसेतु" प्रकल्प है
स्वर्णिम अध्याय की रचना का
धर्म और ब्रह्म के समादर से जीवन की सार्थकता , वैयक्तिक कल्याण और सुसंगठित समाज सरंचना के लिए सामूहिक सार्थक प्रयास से स्वर्णिम अध्याय की रचना का
धर्म रक्षनार्थ:
"ब्राह्मणस्य ही रक्षनेंन रक्षित: स्याद वेदिको धर्म:" !
आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी का यह मत की ब्राह्मण की रक्षा से ही वैदिक धर्म-शाश्वत सनातन धर्म सुरक्षित रह सकता है क्योंकि वर्नाश्रमों का भेद उसी के अधीन है
सनातन संस्कृति
"आ ब्रह्मन ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चस्वी जायताम "
वैदिक राष्ट्र गीत में सर्वप्रथम भगवन से प्रार्थना की गई हे की हमारे राष्ट्र के ब्राह्मण विद्वान हों और ब्रह्मतेज से भरे हों - ऐसे प्रखर पांडित्य और तेजस्वी ब्राह्मण सदा राष्ट्र को मिले
शिक्षा-प्रसार
"ब्राह्मणत्व सार्वभौम शाश्वत बुद्धि वैभव है"
महान सांस्कृतिक नाट्य कृति चन्द्रगुप्त के रचियता महाकवि प्रसाद का यह मत की "ब्राह्मणत्व सार्वभौम शाश्वत बुद्धि वैभव है"
स्वयं शिक्षित होने और समग्र समाज को शिक्षित करने का दायित्वबोध कराता है , क्योंकि शिक्षित और प्रबुद्ध वर्ग की ही जिम्मेदारी है कि समाज में कोई भी व्यक्ति शिक्षा से वंचित ना रहे
संस्कार निर्माण
समग्र समाज संस्कारवान हो इस पवित्र उद्देश्य से हमारी संस्कार क्षमता को सतेज एवं सक्रिय करना
चिंतन , चरित्र , व्यवहार एवं स्वभाव
निर्माण
चिंतन , चरित्र , उत्कृष्ट व्यवहार तथा उदार एवं संवेदनशील स्वभाव का निर्माण
राष्ट्र रक्षनार्थ
महाकवि प्रसाद - जब तक ब्राह्मण है तभी तक भारत "भारत" है
विश्वमंगल कि आकांक्षा

सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया : !
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
माँ कश्चिद् दुःख भाग्भवेत !!

Friday, December 4, 2009

भवाब्धिलंघने अधीरा अशक्ता विश्वभेषजं ! विप्रसेतु समाश्रित्य तरन्तु तर्नोत्सुका:!!


(सांसारिक उलझनों से पार पाने में असमर्थ तथा अधीर महानुभाव"विप्रसेतु "का
आश्रय
लेकर बाधाओं से पार जा सकते हैं !)

"विप्रसेतु "
सेतु है :
प्रत्येक सामाजिक इकाई को " स्व " की सीमित भावना से निकालकर सामाजिक सदभावना, सच्चरित्रता एवं एकजुटता के भाव से "वृहत्तर विप्र समाज " की रचना करने का !
सेतु है :
समग्र ब्राह्मण समाज के समेकित विकास और एकीकृत नव-निर्माण
की दिशा में परिलक्षित रिक्तता को दूर करने का !
सेतु है :
सांगठनिक - सांस्कृतिक सुषुप्तावस्था को झकझोड़कर नव-चेतना प्रसार के लिए
सतत
- सार्थक संवाद का !
सेतु है :
समग्र समाज की संस्कार क्षमता को सतेज एवं सक्रिय कर
संस्कारवान समाज निर्माण का !
सेतु है :
धर्म और ब्रह्म के समादर से जीवन की सार्थकता का
सेतु है :
वैयक्तिक कल्याण और सुसंगठित समाज सरंचना के लिए
सामूहिक सार्थक प्रयास का !
सेतु है :
समाज के सञ्चालन-पालन में उपचारात्मक - सुधारात्मक एवं सकारात्मक सहकार - सहयोग प्रदानकरने का !
सेतु है :
शिक्षित- संस्कारित- स्वस्थ- समर्थ- समरस समाज के निर्माण का