सामाजिक समरसता को समर्पित : "सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:! सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःख भाग्भवेत!!"
Wednesday, May 6, 2026
चाय की चाहत..अपनी.. अपनी..
हम छोटे थे तबकी बात है । मेरे अनुज ने आज तक कभी चाय नहीं पी तब भी नहीं पीता था । पर जब चाय का समय होता तो माताराम अनुज का स्कूल से आने का इंतजार करती ओर उसके आने के बाद पास बिठाकर खुद चाय पीती । उनका कहना था कि इसके बिना चाय उग-ती नहीं ।
अब भला चाय का क्या उग-ना । तब समझ नहीं आया । बड़े हुवे तब समझ आया जब हमें भी चाय का शौक लगा। दरअसल अकेले चाय पीने का मन नहीं करता जब साथ होता है तभी चाय पीने का मज़ा आता है।
इसीलिए कहा भी जाता है की चाय तो एक बहाना है, बस समय साथ बिताना है । बैठक बाजी चाय से ही जमती है । सुबह सुबह अखबार पढ़ने का आनंद भी चाय की चुस्कियों के साथ ही आता है देश दुनियां की खबरों के साथ अकेलापन जो नहीं होता ।
जगराता हो या ब्याह शादी का माहौल चाय सब भागदौड़ की थकावट भगाने का देशी नुस्खा है। आजकल तो जाना नहीं होता पर पहले जब जागरण में जाते थे, शौक था भजन सुनने का तो हमारे एक परिचित भजन गायक जब "चाय तूं चोखी चाली रे छोटा मोटा सगलां झाली रे' की तान लगाते इसका मतलब साफ था....अब चाय चाहिए ।
चाय बनाना भी एक कला है । वही पानी, वही दूध, वही चाय पत्ती, वही अदरक या इलायची पर सब के हाथ की बनी चाय का जायका अलग ही होता है । बुजुर्वा महिलाओं को शायद यह अच्छा न लगे पर मेरा अनुभव है कि आमतौर पर बच्चियां चाय अधिक बढ़िया बनाती है शायद ईश्वरीय कृपा ।
आपको शायद अटपटा लगे पर चाय के स्वाद का संबंध स्थान विशेष से भी होता है । नॉर्थ ईस्ट में प्रचलित काली चाय वहीं ज्यादा स्वादिष्ट लगती है। हरियाणा में अच्छी चाय मतलब खड़ा चम्मच चाय । यानि अधिक दूध और उससे कहीं ज्यादा चीनी । सीधी सी बात है अधिक शारीरिक मेहनत के कारण अधिक चीनी की जरूरत जिससे शरीर को ज्यादा एनर्जी मिल सके । यही कारण है कामगार लोग अपेक्षाकृत अधिक मीठी चाय ही पसंद करते हैं।
युवा पीढ़ी की बैठक बाजी, या व्यावसायिक चर्चा के लिए बड़े शहरों में आजकल टिन टप्पर वाली चाय की दुकानें "टपरी" या एयरकंडीशंड लाज़वाब साजसज्जा वाली स्टारर दुकानें बड़े ब्रांड नाम "MBA चाय वाला" भी मशहूर हो रही है ।
केशर चाय का अपना रुतबा है तो कुल्हड़ वाली चाय भी कम नहीं है जनाब ! कुल्हड़ वाली चाय में मिट्टी की प्यारी सी सौंधी सुगंध सीधे दिल को सुकून देती है ।
रेल का सफर कर रहे हों, सफर लंबा हो तो ओर किसी चीज की तलब हो या ना हो चाय की तलब जरूर हो जाती है । आमतौर पर ट्रेन में या रेलवे स्टेशन पर चाय अच्छी नहीं मिलती परन्तु रतनगढ़ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही मुसाफिर स्टेशन के बाहर दौड़ते थे, तब आधा घंटे का ठहराव होता था ओर चाय भी लाजवाब ।
सोचिए किसी रेलवे स्टेशन की पहचान ही चाय से हो ? आप सफर कर रहे हों रात के 12 बजे हों या सुबह के 4 बजे हों जब "चाय-चाय" की आवाजें सब मुसाफिरों को जगा दें तो समझ लीजिए आप फुलेरा जंक्शन पर है।
चाय की चाहत भी अपनी अपनी है । किसी को कम तो किसी को ज्यादा । "कटिंग", "फुल" या "डबल डोज" वह भी समय ओर जरूरत के हिसाब से ।
सच मानिए हमारा चाय से अटूट रिश्ता बन गया है । बिस्किट बिना चाय नहीं चलते तो बरसात में पकौड़े बिना चाय जमते ही कहां है। पढ़ाई करते समय, भक्ति करते समय, काम करते समय चाय तो जरूरी हो ही गई है। घर पर कोई आए तो स्वागत सत्कार चाय से ओर कहीं कोई जाए बाईदवे बिना चाय के बैरंग लौट आए तो...कैसे लोग हैं चाय के लिए ही नहीं पूछा ? बेटी चाय ले आओ....मतलब अब आ जाओ लड़के वाले इंतज़ार कर रहे हैं ।
खुशी का माहौल हो या गमी का चाय का साथ तो चाहिए ही शायद इसीलिए -
जगत में चाय बड़ी बलवान
सुबह चाय और शाम चाय
तो चाय का करूं बखान
जगत में चाय बड़ी बलवान।
-रामकृष्ण सेवदा, बीकानेर
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